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जानें भारतीय सेना रिटायर्ड आर्मी डॉग्स के साथ क्या करती है

भारतीय सेना से जुड़े कई ऐसे नियम है जिनके बारें में आम नागरिक नहीं जानते हैं। सेना के कुछ अपने उसूल और बाध्यताएं होती है जिसकी वजह से वह सेना की अंदरूनी बातों को पब्लिक में नहीं बताते हैं। ऐसा ही एक नियम है जब कोई स्निफर डॉग रिटायर होता है तो सेना उसे गो’ली मार देती है। यह सुनने में थोड़ा नृशंस लगता है लेकिन ऐसा करने के पीछे कारण होता है। आइये इस बारें में विस्तार से जानते हैं।

सेना जिन कुत्तों को ट्रेनिंग देकर सेना में शामिल करती हैं उन्हें ‘स्निफर डॉग’ कहा जाता है। हालांकि यह सर्वज्ञात है कि कुत्ते सबसे वफादार जानवर होते हैं। आदमी एक बार गद्दारी कर सकते हैं लेकिन कुत्ते नहीं। फिर ऐसा क्यों होता है कि अपने ही सिखाए गए कुत्तों को रिटायर होने के बाद सेना मार देती है। एक RTI के सवाल में भारतीय सेना ने इसका जवाब दिया है।

सुरक्षा की दृष्टि से किया जाता है ऐसा

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भारतीय सेना ने बताया है कि इन कुत्तों को ट्रेंड किया गया होता है। यह करीब 8 से 10 साल तक देश की सेवा करते है। इनको सुरक्षा की दृष्टि से रिटायर होने के बाद मार दिया जाता है। क्योकि इन्हे सेना के कैंपस, ठिकाने और बेस के बारें में जानकारी होती है और अगर यही कुत्ते किसी गलत आदमी के हाथ लग गए तो यह बहुत खतरनाक साबित हो सकता है। देश और सेना से जुड़ी कोई भी जानकारी लीक न हो इसलिये इन कुत्तों को रिटायर होने के मार दिया जाता है।

सेना ने यह भी बताया है कि अगर ये कुत्ते बीमार हो जाते हैं और ये 1 महीने में ठीक नहीं होते है तो सेना के लोग इन्हें मार देते हैं। क्योंकि सेना नहीं चाहती है कि जिसने देश के लिए अपनी सेवा दी है वह बाद में कोई कष्ट सहे। इन स्निफर डॉग्स को तब तक जीवित रखा जाता है जब तक यह रिटायर या बीमार नहीं होते है। इन कुत्तों को सर्विस के बाद देखभाल करना भी काफी महंगा होता है।

सैनिक की तरह किया जाता है अंतिम संस्कार

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इस बात से जाहिर होता है कि सेना इन कुत्तों को सुरक्षा की दृष्टि से मारती है। जब भी कोई स्निफर डॉग मारा जाता है तो उसे तोपों की सलामी दी जाती है और बाकायदा एक सैनिक की तरह अंतिम संस्कार किया जाता है। वर्तमान में भारतीय सेना में लगभग 1200 प्रशिक्षित स्निफर डॉग हैं।

ये मुख्य रूप से विदेशी नस्ल के जर्मन शेफर्ड, लैब्राडोर, बेल्जियम शेफर्ड और ग्रेट स्विस माउंटेन डॉग हैं जिन्हें रेमाउंट और वेटरनरी कोर (RVC) द्वारा प्रशिक्षित किया जाता है इसके अलावा अब सेना मुधोल हाउंड के रूप में जानी जाने वाली स्वदेशी कुत्ते की नस्ल को भी सेना में शामिल कर रही है।

Indian Army Dog

सबसे पसंदीदा आर्मी डॉग जर्मन शेफर्ड और लैब्राडोर के प्रजाति के होते हैं क्योंकि ये किसी भी कंडीशन में किसी भी चीज़ को बहुत आसानी और जल्दी से सीख लेते हैं। हालाँकि कई बार देखा गया है एनिमल एक्टिविस्ट सेना द्वारा कुत्तों के मारने के कदम का विरोध करते रहें है। सेना उन्हें देश की सुरक्षा का हवाला देकर इसे देश के लिए जरूरी बताती है। यह भारत में ही नहीं होता है बल्कि हर देश के ट्रेंड कुत्तों के साथ ऐसा ही होता है।

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“मैं धारक को 100 रुपये अदा करने का वचन देता हूँ” नोट पर यह वाक्य क्यों लिखा होता है ?

हर एक चीज़ की कीमत होती है। हमने अक्सर ये वाक्य किसी न किसी से सुना होगा। क्या कभी आपने सोचा है कि जिस नोट की कीमत होती है वह कौन तय करता है? अगर भारतीय रूपये की बात की जाए तो इसपर “मै धारक को ‘इतने’ रूपये अदा करने का वचन देता हूँ” लिखा होता है।

क्या आपने कभी सोचा है कि यह वचन किसका होता है और यह क्यों लिखा होता है। यह सवाल कई बार इंटरव्यू में भी पूछा जा चुका है इसलिए आपको इसका जवाब मालूम होना चाहिए। अगर आपको नहीं पता तो आइये इस बारें में विस्तार से जानते हैं।

“मैं धारक को रुपये अदा करने का वचन देता हूँ” इसका मतलब ?

RBI

यह वाक्य RBI गवर्नर की शपथ होती है। इसका मतलब होता है कि नोट की कीमत देने का दायित्व RBI के गवर्नर का है। आपको बता दें कि भारत में नोट छापने का काम रिजर्व बैंक करता है। एक रुपये को छोड़कर सभी नोटों पर RBI गवर्नर के हस्ताक्षर होते हैं।

भारत में मुद्रा और बैंक से जुड़े तमाम नियमों और कामों को केन्द्रीय बैंक ‘भारतीय रिज़र्व बैंक ऑफ़ इंडिया’ (RBI) देखता है। जितने भी नोट होते हैं उन सब पर RBI के गवर्नर के हस्ताक्षर होते हैं बाकी 1 रुपए के नोट पर वित्त सचिव के हस्ताक्षर होते हैं।

भारतीय रिज़र्व बैंक की स्थापना 1 अप्रैल 1935 को भारतीय रिज़र्व बैंक अधिनियम, 1934 के तहत हुई थी। RBI का मुख्यालय मुंबई में है। भारतीय रिज़र्व बैंक अधिनियम, 1934 के आधार पर मुद्रा प्रबंधन की भूमिका प्रदान की गयी थी। भारतीय रिज़र्व बैंक अधिनियम की धारा 22 के तहत RBI को नोट जारी करने का अधिकार देती है।

भारत में करेंसी नोटों का इतिहास और विकास

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नोटों की छपाई का काम भारत में न्यूनतम आरक्षित प्रणाली के आधार पर किया जाता है। 1957 से यह प्रणाली लागू है। इस प्रणाली के अनुसार RBI को यह अधिकार है कि वह RBI फण्ड में कम से कम 200 करोड़ रूपये मूल्य संपत्ति अपने पास रखे। इस 200 करोड़ में 115 करोड़ का सोना और शेष 85 करोड़ विदेशी संपत्ति अपने पास हर समय रखने की बाध्यता होती है। इतनी संपत्ति अपने पास रखने के बाद RBI देश की जरूरत के अनुसार नोट छापती है। नोट छापने से पहले RBI को सरकार से अनुमति लेनी पड़ती है।

नोट पर ‘मै धारक को इतने रूपये अदा करने का वचन देता हूँ’ लिखने का मतलब होता है कि RBI आपके उस नोट की कीमत का सोना अपने पास रिज़र्व रखे हुए है। अगर आपके पास 100 रुपये है तो इसका मतलब है कि आपके 100 रुपये की कीमत का सोना RBI के पास रिज़र्व है और सुरक्षित है। RBI इसलिए यह कथन लिखकर धारक को वचनबद्धता दर्शाता है।

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नोटों पर यह कथन लिखने का एक और मतलब होता है कि अगर कोई भी व्यक्ति नोट को लेने से मना कर रहा है तो इसका मतलब वह RBI पर विश्वास नहीं कर रहा है और उसकी अवज्ञा कर रहा है अर्थात क़ानून तोड़ रहा है। नोटों की प्रमाणिकता और वैधता लोगों के बीच बनी रहे इसलिए RBI नोट पर यह कथन लिखती है।

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आज के आधुनिक जीवन में लोगों का रहन-सहन ऐसा हो गया है कि लोग वास्तुशास्त्र पर ध्यान ही नहीं देते हैं। वास्तुशास्त्र का महत्व हमारे वेद-पुराणों में बताया गया है। अगर हम अपने घर में वास्तुशास्त्र का उपयोग करते हैं तो घर में पॉजिटिविटी बनी रहती है। घर में सुख-शांति बनाये रखने के लिए वास्तुशास्त्र का प्रयोग बहुत ही जरूरी होता है। घर में चीज़ों के रख-रखाव और उनके चयन में कई तरह की गलतियाँ होती है जिसकी वजह से घर में नेगेटिविटी रहती है। यह नेगेटिविटी आपको मानसिक, शारीरिक और आर्थिक रूप से परेशान कर सकती है।

आज हम वास्तुशास्त्र से जुड़ी कुछ ऐसी चीज़ें बताने जा रहे हैं जिनसे घर में सुख-शांति बनाये रखने में मदद मिलती है। यह टिप्स बिस्तर से जुड़ी है। जिस बिस्तर पर आप सोते हैं उसके आसपास कौन सी चीज़ें होनी चाहिए और कौन सी नहीं, इनके बारें में आज हम विस्तार से जानेंगे।

ऐसा कहा जाता है कि बेड वास्तु के अनुसार नहीं है। इसलिए घरों में बेड नहीं रखना चाहिए। लेकिन अगर घर में बेड रखना ही है तो उससे जुड़े कुछ नियम अपनाने चाहिए। बेड को घर में रखने से पहले उसके नीचे दरी या चटाई बिछानी चाहिए। बेड जमीन से जुड़ा हुआ बिल्कुल नहीं होना चाहिए।

कुछ चीज़ें ऐसी हैं जो बेड के आस-पास नहीं होनी चाहिए। आइये इस बारें में जानते हैं।

1- जूते चप्पल

Vastu Shastra Shoes

अक्सर देखा गया है कि लोग जगह की कमी के कारण बेड के नीचे ही जूते-चप्पल रख देते हैं, लेकिन ऐसा नहीं करना चाहिए। बेड के नीचे चप्पल रखने की आदत को सुधार लेना चाहिए। कहा जाता है कि जूते और चप्पल में बहुत नकारात्मक एनर्जी होती है। अगर आप इन्हें बेड के नीचे रखेंगे तो सोने के दौरान यह नकारात्मक एनर्जी आपके के अंदर समाहित हो जायेगी जो आगे चलकर आपके लिए नुकसानदेह साबित होगी।

2- पानी

पानी पीने के लिए बेड से दूर न जाना पड़े इसके लिए लोग बेड के पास ही पानी रखना प्रेफर करते हैं। लेकिन ऐसा नहीं करना चाहिए क्योंकि इससे चन्द्रमा प्रभावित होता है। इसके कारण मनोरोग जैसी समस्याएं जन्म लेती हैं। इसके अलावा सोते समय पानी में मौजूद एलिमेंट आपको सोने में बाधा पहुचाते हैं।

3- बर्तन

Food on Bed

वास्तुशास्त्र के अनुसार जिस बिस्तर पर आप सोते हैं उसपे कभी भी बर्तन नहीं रखना चाहिए। कुछ लोग कहते हैं कि प्लास्टिक और कांच के बर्तन रखने से कुछ नहीं होता है लेकिन बेड पर किसी भी प्रकार के बर्तन रखने से बचना चाहिए। अगर आप ऐसा करते हैं तो इससे आपके घर में और आप में नकारात्मक एनर्जी आयेगी जो आपके सुखद जीवन के लिए अच्छा नहीं होगी।

4- पायदान

ऐसा देखा गया है कि अधिकतर लोग बेड के नीचे पायदान रखते हैं। बेड पर चढ़ने से पहले पायदान में पैर पोछते हैं। पायदान हमेशा बेड से कुछ दूरी पर होना चाहिए लेकिन बेड के नीचे नहीं। बेड के नीचे पायदान जाने से घर में नकारात्मक उर्जा आती है।

5- मोबाइल

Using Phone Before Going To Sleep

अक्सर रात को लोग मोबाइल चलाते हुए सो जाते हैं और मोबाइल बिस्तर पर ही रह जाता है। बिस्तर पर या सिरहाने पर फ़ोन का रखना वास्तुशास्त्र के हिसाब से सही नहीं होता है। इसके अलावा बिस्तर पर किसी भी प्रकार का गैजेट नहीं रखना चाहिए। अगर आप मोबाइल में अलार्म लगाकर रखना चाहते हैं तो इसे बिस्तर से इतनी दूर रखें जिससे आपका हाथ इस तक न पहुँच पाये।

इससे आप सुबह जब अलार्म बजेगा तो उठकर बंद कर पाएंगे और यह वास्तुशास्त्र के हिसाब से भी ठीक रहेगा। इसके अलावा इलेक्ट्रानिक गैजेट से रेडिएशन निकलती है जो सेहत के लिए सही नहीं होती है इससे सिरदर्द और चक्कर की शिकायत हो जाती है।

अगर आप भी घर में और अपने मन में निगेटिव एनर्जी नहीं चाहते हैं तो उपरोक्त बताई गयी चीज़ों को ध्यान में रखें।

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रेलवे स्टेशन के बोर्ड पर क्यों लिखा जाता है समुद्र तल से ऊंचाई

भारतीय रेलवे से सम्बंधित कई ऐसे संकेत और नियम होते हैं जिसे हम सामान्य नागरिक देखता तो हैं लेकिन उन्हें समझता नहीं है। हम साइनबोर्ड पर लगे संकेतों को देखकर उन्हें अनदेखा कर देते हैं। भारतीय रेलवे में न केवल नागरिकों के लिए संकेत बनाये गए है बल्कि ड्राइवरों, लाइनमैन, गार्ड और अन्य कर्मचारियों के लिए भी इन संकेतों का इस्तेमाल किया जाता है। कर्मचारियों के लिए ये संकेत इसलिए बनाए जाते है ताकि ट्रेन का परिचालन सुचारु रूप से चलता रहे।

भारत में रहने वाले लगभग हर नागरिक ने ट्रेन में यात्रा जरूर की होगी। यात्रा करते समय रेलवे स्टेशन पर एक चीज लिखी हुई दिखती है ‘समुद्र तल से ऊंचाई’ , इसके बारें में शायद ही किसी को मालूम होगा। समुद्र तल से ऊंचाई (Mean Sea Level, MSL) रेलवे स्टेशन प्लेटफार्म के अंत में लिखा होता है।

अब सोचने वाली बात यह है कि आखिर ‘समुद्र तल से ऊंचाई’ का क्या मतलब है? आखिर यह बोर्ड पर क्यों लिखा होता है? क्या यह यात्रियों को बताने के लिए होता है या रेल कर्मचारियों के लिए। आइये आज इस बारें में विस्तार से जानते हैं।

क्यों लिखा होता है समुद्र तल से ऊंचाई

Mean Sea Level kya hota hai

यह सर्वज्ञात है कि पृथ्वी गोल है। यही कारण है पृथ्वी के अलग-अलग हिस्से पर कर्व आता है। पृथ्वी की सतह से ऊंचाई नहीं मापी जाती है। पृथ्वी की सतह से नापने के लिए एक ऐसे पॉइंट या बिंदु की जरूरत होती है जो हमेशा कांस्टेंट रहे। इसलिए वैज्ञानिकों ने MSL अर्थात समुद्र तल से ऊंचाई का कांसेप्ट पेश किया।

समुद्र तल से ऊंचाई की गणना करना बहुत ही सहज और सरल होता है। इसका कारण यह है कि समुद्र के पानी की सतह हर जगह समतल अर्थात एक समान रहती है। MSL का सबसे ज्यादा प्रयोग सिविल इंजीनियरिंग में किया जाता है। सिविल इंजीनियर बिल्डिंग बनाते समय किसी जगह (साइट) की ऊंचाई नापने के लिए MSL का प्रयोग करते हैं।

आपको बता दें कि रेलवे स्टेशन पर MSL का संकेत यात्रियों के लिए नहीं होता है। यह ट्रेन के ड्राइवर और गार्ड के लिए लगाया जाता है।

जब कहीं ‘200 मीटर समुद्र तल से ऊंचाई से 250 मीटर की ऊंचाई’ लिखा होता है तो इसका मतलब होता है कि ड्राइवर को 50 मीटर चढ़ाई के लिए इंजन को और ज्यादा पॉवर की जरूरत पड़ेगी। इन संकेतों से ड्राइवर यह अंदाजा लगाता है कि चढ़ाई या ढलान के लिए इंजन को कितना पॉवर देना है। जब ट्रेन ऊपर से नीचे की ओर आती है तो ड्राइवर को फ्रिक्शन लगाना पड़ता है। साफ़ शब्दों में समझा जाए तो MSL का प्रयोग ऊंचाई या ढलान देखकर स्पीड को कम या ज्यादा करने के लिए किया जाता है।

इसके अलावा MSL का प्रयोग ट्रेन के ऊपर लगे बिजली के तारों को समान ऊंचाई देने के लिए किया जाता है जिससे बिजली ट्रेन के तारों से हर समय टच होती रहे।

आइये रेलवे के कुछ ऐसे नियम के बारें में जानते है जिनसे काफी लोग अनजान हैं-

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1- आपको बता दें कि टीटीई अब रात के दस बजे के बाद आरक्षित यात्रियों का टिकट नहीं चेक कर सकता है। रेलवे बोर्ड ने ऐसा निर्णय इसलिए लिया है ताकि यात्रियों की नींद खराब न हो। ऐसा देखा गया है कि टीटीई बीच रात में सोते हुए यात्रियों को जगाकर टिकट चेक करते थे। टीटीई अब रात में दस बजे से पहले और सुबह छह के बाद ही टिकट चेक करेंगे। इस टाइम में अगर टिकट चेक कर लिया जाता है तो दुबारा टिकट नहीं चेक किया जायेगा। लेकिन कुछ प्रावधान ऐसे भी हैं जिसके अंतर्गत बीच रात में भी टीटीई चेक कर सकता है। आइये जानते हैं।

– अगर यात्री रात दस बजे के बाद ट्रेन में चढ़ता है और उसकी यात्रा सुबह छह बजे तक रहती है तो इस कंडीशन में टीटीई उसका टिकट चेक कर सकता है।

– बोर्डिंग के पश्चात टीटीई ने टिकट चेक नहीं किया तो इस कंडीशन में भी टिकट बीच रात में चेक किया जा सकता है।

2- सुप्रीम कोर्ट के आदेशानुसार अगर किसी यात्री का सामान ट्रेन में गुम या चोरी हो जाता है तो रेलवे विभाग का यह कर्तव्य है कि यात्री का सामान छह महीने के अंदर में खोज करके दे नहीं तो उस यात्री को उसके सामान का हर्जाना दें। अपने सामान के एवज में हर्जाना पाने के लिए यात्री को कुछ कागजी प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है। जब सामान खो जाए तो यात्री रेल पुलिस को एक एफआईआर के साथ एक फार्म भरे, जिसमे यह उल्लेख करे कि अगर छह महीने के अंदर सामान न मिले तो वह उपभोक्ता फोरम में जा सकता है। सामान की कीमत का आकलन करने के बाद उपभोक्ता फोरम रेलवे को आदेश देगा कि यात्री को हर्जाना दे। एफआईआर दर्ज करते समय जीआरपी को यात्री से उपभोक्ता फोरम का फार्म भरवा लेना चाहिए।

वेटिंग टिकट से आरक्षित कोच में नहीं कर सकते यात्रा

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3- अगर आपके पास वेटिंग टिकट है तो ट्रेन के आरक्षित कोच में आप यात्रा नहीं कर सकते हैं। अगर यात्रा करते समय टीटीई आपको पकड़ता है तो आपको दो सौ पचास रुपए जुर्माने के रूप में देने पड़ेंगे और अगले स्टेशन से जनरल बोगी से यात्रा करनी पड़ेगी। लेकिन अगर चार यात्रियों में से किसी दो के पास कन्फर्म टिकट है तो बाकी दो अन्य लोग उनकी टिकट पर जा सकते हैं।

4- भारतीय रेलवे में ई बेडरोल की सुविधा उपलब्ध है। ऑनलाइन आप बेडरोल को बुक करा सकते हैं। यह सुविधा अभी नई दिल्ली, हजरत निजामुद्दीन, सीएसटी और मुंबई सेन्ट्रल स्टेशनों पर उपलब्ध है। इन चार स्टेशन पर 140 रुपये में दो बेडशीट और एक तकिया को किराये पर लिया जा सकता है।

रेल मंत्रालय के आदेशानुसार अगर कोई 18 साल से कम उम्र का बच्चा ट्रेन में बिना टिकट के यात्रा करते हुए पकड़ा जाता है तो उससे केवल टिकट का पैसा वसूल किया जायेगा जुर्माना नहीं। अगर बच्चे के खिलाफ कार्रवाई करनी हो तो सबसे पहले एक रिपोर्ट तैयार करनी पड़ेगी उसके बाद ही उस बच्चे पर कार्रवाई की जा सकेगी।

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भारत में इस जगह एक साल के लिए किराए पर मिलती है मनपसंद पत्नी

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भारत जैसे विशाल देश में कई ऐसी प्रथाएं और रीति-रिवाज हैं जो एक सभ्य समाज की नज़र में गलत तो है लेकिन कानून प्रक्रिया होने के बावजूद भी उसपर अंकुश नहीं लग पाता है। देश में कई सारी कुप्रथाएं है जो अभी भी धड़ल्ले से अंजाम दी जाती है। क्या कोई सोच सकता है कि भारत देश में कोई ऐसी भी जगह होगी जहाँ पर लड़कियों की बोली लगायी जाती होगी।

साल भर के लिए लड़कियां ली जाती हैं किराए पर

जी हाँ, ऐसा होता है। वो भी भारत के मध्य प्रदेश राज्य में। दरअसल मध्य प्रदेश के शिवपुरी नाम की जगह पर ”धड़ीचा प्रथा’ काफी प्रचलित है। इसके अंतर्गत लड़कियों को एक साल के लिए किराये पर लिया जाता है। जो व्यक्ति लड़की को किराये पर लेता है वह लड़की की किराए की कीमत करीब 15,000 से 25,000 तक देता है।

लड़कियों के परिवार वालों को नहीं है कोई दिक्कत

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शिवपुरी में हर साल लड़कियों की मंडी लगने पर लड़कियों के परिवार वालों को कोई परेशानी नहीं होती है। बल्कि यह सब उनकी मर्जी से होता है। यहाँ पर हर साल लड़कियों को अपनी पत्नी बनाने के लिए खरीद-फरोख्त होती है। लड़कियों के घरवाले ख़ुशी से लड़की को साल भर के लिए किराए पर दे देते हैं।

अगर किराए पर लेने वाला व्यक्ति लड़की को अनुबंधित समय से ज्यादा अपने साथ रखना चाहता है तो परिवार वाले इस बात पर सहमत हो जाते हैं और लड़की की शादी उससे करवा देते हैं।

होती है पूरी कागजी कार्रवाई

आपको बता दें कि यह सौदा पूरी तरह से कागजी कार्रवाई के बाद किया जाता है। इसके लिए 10 रुपये से लेकर 100 रुपये तक के स्टाम्प पेपर होते हैं जिनपे सौदे से सम्बंधित नियमों और शर्तों की लिखा पढ़ी की जाती है।

दशकों से चली आ रही है यह प्रथा

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किराए पर लड़की लेने की यह प्रथा आज से नहीं बल्कि दशकों से चली आ रही है। लेकिन आज तक किसी ने इसके खिलाफ कोई आवाज नहीं उठाई। महिला सशक्तिकरण का ढोल पीटने वाली संस्थाएं भी इस प्रथा के खिलाफ कुछ नहीं कर पाई हैं।

लड़कियों का बार-बार होता है सौदा

यहाँ पर लड़कियों की हालत ऐसी है कि जब वह एक साल किसी के साथ रह लेती हैं तो उसके बाद उनकी बोली फिर लगायी जाती है। फिर वह एक साल के लिए बिकती है और उस आदमी के साथ पूरे साल भर उसकी पत्नी का धर्म निभाती है। ऐसा यहाँ पर इस कुप्रथा का उपयोग अमीर लोग अपनी अय्याशी को पूरा करने के लिए करने लगे है।

तोड़ा जा सकता है अनुबंध

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इस प्रथा की आड़ में गरीब लड़कियों का सौदा होता है। इसमें क्षेत्र के अमीर लोग अपनी पसंद की औरत की बोली लगाते हैं। इसके बाद एक अनुबंध किया जाता है। सामान्य तौर पर यह अनुबंध 6 महीने से 1 साल के बीच का होता है। अनुबंध बीच में भी छोड़ने का रिवाज है। इसे ‘छोड़-छुट्टी’ कहते हैं। अनुबंध बीच में छोड़ने पर लड़की को अनुबंधित पति को शेष राशि लौटानी पड़ती है।

इस प्रथा के पीछे क्या है वजह

इस प्रथा के चलन में होने के पीछे सबसे बड़ा कारण लिंगानुपात है। लड़कियों की संख्या दिन-ब-दिन कन्या भ्रूण हत्या के कारण घट रही है। इसलिए लोग इस प्रथा को अपना रहे हैं। यह प्रथा मध्य प्रदेश में ही नहीं बल्कि कई जगह अन्य राज्यों में भी फैली है।

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गोविंदा की वो 5 गलतियां, जिन्होंने बर्बाद कर दिया उनका करियर, ऐसे हुए बॉलीवुड से गायब

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बॉलीवुड में ‘चीची’ के नाम से मशहूर सुपरस्टार गोविंदा कोई अनजाना नाम नहीं है। हिंदी फिल्मों को देखने वाला लगभग हर दर्शक गोविंदा को स्क्रीन पर देखकर जरूर हंसा होगा। अपनी कॉमिक टाइमिंग और शानदार डांस मूव्स से करोड़ों दिलों पर राज करने वाले गोविंदा इस समय भले ही गुज़रे ज़माने के सुपरस्टार हो गए हो लेकिन उनकी अदाकारी आज भी दर्शकों को लुभाती है।

आज गोविंदा पहले की तरह सुपरस्टार नहीं रहे। इस समय वह कम ही फिल्मों में नज़र आते हैं। लाइमलाइट से दूर हैं। अपनी पहले जैसी धमक और पॉपुलैरिटी खोने के लिए गोविंदा खुद ज़िम्मेदार हैं। वह सुपरस्टार तो बने लेकिन अक्षय कुमार, अजय देवगन, शाहरुख़ खान, सलमान खान और आमिर खान की तरह अपना स्टारडम बरकरार नहीं रख पाये।

अपने करियर के पीक पर रहने पर गोविंदा ने कई सारी ऐसी गलतियाँ की जिनकी वजह से उन्होंने अपना स्टारडम खो दिया। बीते 21 दिसंबर को उन्होंने अपना 56वां जन्मदिन मनाया। आइये जानते हैं कि गोविंदा ने अपने करियर में ऐसी कौन सी गलतियां की, जिसकी वजह से वह आज अपने करियर के इस मोड़ पर हैं।

लीड रोल की जिद

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बढ़ती उम्र के साथ लीड रोल की मांग करना भी गोविंदा के करियर के लिए घातक सिद्ध हुआ। लीड रोल के चक्कर में उन्होंने कई सारी फ़िल्में गवां दी। उन्होंने अपने के इंटरव्यू में खुलासा भी किया था कि उन्हें फिल्म ‘देवदास’ में चुन्नीलाल का रोल ऑफर हुआ था लेकिन उन्हें यह रोल सपोर्टिंग लगा और उन्होंने यह फिल्म करने से मना कर दिया। बाद में यह रोल जैकी श्राफ ने किया जो आगे चलकर बहुत मशहूर हुआ।

ऐसी कई फिल्मे रहीं हैं जो लीड रोल की जिद की वजह से गोविंदा के हाथों से फिसल गयी। उनके समकालीन एक्टर अनिल कपूर और संजय दत्त ने सपोर्टिंग रोल को मना नहीं किया। आज ये दोनों फ़िल्में कर रहें हैं। यही चीज़ गोविंदा ने मिस कर दी।

राजनीति में प्रवेश करना

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ऐसा देखा गया है कि जब एक्टर अपने करियर के ढलान पर होता है तो वह राजनीति में उतरता है। लेकिन गोविंदा अपने करियर के पीक पर ही राजनीति में प्रवेश करने का फैसला किया। उन्होंने कांग्रेस पार्टी की तरफ से चुनाव लड़ा, वह जीते भी लेकिन उनका फ़िल्मी सफ़र राजनीति के चक्कर में कहीं थम सा गया। हालांकि गोविंदा को बाद में महसूस हुआ कि राजनीति ने उनके करियर को बर्बाद कर दिया। इसके बाद वह फिल्मों में वापस तो आये लेकिन पहले जैसी धमक नहीं जमा पाए।

डेविड धवन से अनबन

Govinda with David Dhawan

बॉलीवुड में एक समय था जब डेविड धवन और गोविंदा की जोड़ी मशहूर थी। यह जोड़ी बॉक्स ऑफिस पर हिट मानी जाती थी। दोनों ने साथ में लगभग 20 फिल्मों में काम किया। इस हिट जोड़ी ने कई सारी ब्लॉकबस्टर फिल्में दी जैसे ‘हीरो नंबर 1’ ‘कूली नंबर 1’ ‘शोला और शबनम’। बतां दे कि इस जोड़ी की आखिरी फिल्म ‘पार्टनर’ थी जो कि साल 2007 में आई थी। गोविंदा का जब से डेविड धवन के साथ रिश्ता ख़राब हुआ तब से वह फिल्मों में अपना चार्म वापस नहीं ला पाए।

सलमान के साथ मनमुटाव

Govinda-Salman

सलमान और गोविंदा की दोस्ती की मिसाल बॉलीवुड में दी जाती थी। दोनों ने ‘पार्टनर’ फिल्म साथ में की है जो सुपरहिट साबित हुई थी। लेकिन एक समय ऐसा भी था जब सलमान और गोविंदा में मनमुटाव हो गया था। इस मनमुटाव का कारण था कि सलमान गोविंदा की बेटी को दबंग फिल्म से लांच करने वाले थे लेकिन जब ऐसा नहीं हुआ तो दोनों के रिश्तों में दरार आ गयी। इसका असर गोविंदा के करियर पर भी पड़ा।

गोविंदा की फिटनेस

आजकल के सभी एक्टर चाहे वो सपोर्टिंग हो या लीड, सभी फिट नज़र आते हैं। एक समय ऐसा था जब गोविंदा काफी मोटे हो गए थे। उनका मोटापा भी उनके लिए काफी नुकसानदेय साबित हुआ। उन्हें लीड रोल में फ़िल्में मिलनी बंद हो गयी। बाद में लोगों की यही सोच भी बन गयी कि ऐसी फिटनेस वाले एक्टर साइड रोल ही कर सकते हैं। बेदर्द बॉलीवुड ने फिटनेस की वजह से गोविंदा को स्टारडम से दूर कर दिया।

इसमें कोई दो राय नहीं है कि गोविंदा एक शानदार एक्टर है। उनके जैसा एक्टर शायद ही कोई पैदा होगा। लेकिन अगर गोविंदा ने समय को ध्यान में रखकर अपने आप को बदला होता तो आज उनके फैन्स उनकी अदाकारी को पर्दे पर देख रहे होते।

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